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निश्चलता

एक ओर से बनता,

एक ओर से बिखरता रहा हूँ मैं 

जैसा था, 

ताउम्र वैसा ही रहा हूँ मैं 

कविता

बिखरे शब्द समेटकर

कविता रचने का सुकून

ठीक वैसा ही है 

जैसा

तुम्हारी मुस्कान

निहारने में था

दूरी

अब तक तो हम ही नहीं मिल पाते थे,
आज हमारी भेजी पाती भी लौट आई |
कहने लगी, तुमने ठिकाना बदल लिया है|| 
A stranger city, a quiet café,
That intoxicated, paused moment,
Her eyes found trust in mine,
Mine drowned in hers